गोविंद सिंह वर्मा की अंतिम यात्रा में शोक के बजाय

100 वर्ष के पिता की अंतिम इच्छा पर मातम नहीं, गूंजा संगीत

सीहोर जिले के इछावर क्षेत्र के ग्राम दीवाड़िया में एक अनोखी अंतिम यात्रा ने पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यहां 100 वर्ष से अधिक आयु के वयोवृद्ध गोविंद सिंह वर्मा के निधन के बाद शोक नहीं, बल्कि संगीत और उल्लास के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। गांव में ढोल-ताशों, डीजे और भजनों के बीच निकली इस अंतिम यात्रा ने हर किसी को भावुक कर दिया।

पूरे सम्मान के साथ पूरा किया

परिजनों के मुताबिक, गोविंद सिंह वर्मा ने जीवन के अंतिम दिनों में अपने बेटों से इच्छा जताई थी कि उनकी मृत्यु के बाद घर में मातम या रोना-धोना न हो। उन्होंने कहा था कि जब वह इस संसार से विदा लें, तो माहौल खुशियों और संगीत से भरा होना चाहिए। पिता की इस अंतिम इच्छा को बेटों बाबूलाल और बद्री प्रसाद वर्मा ने पूरे सम्मान के साथ पूरा किया।

सन्नाटा और दुख का माहौल होता है

आमतौर पर जहां शवयात्रा में सन्नाटा और दुख का माहौल होता है, वहीं दीवाड़िया गांव में अलग ही दृश्य देखने को मिला। गांव के लोग गम में डूबने के बजाय एक सफल और संतोषपूर्ण जीवन का उत्सव मनाते नजर आए। अंतिम यात्रा में शामिल लोग ढोल की थाप पर चलते हुए गोविंद सिंह वर्मा को श्रद्धांजलि दे रहे थे।

ग्रामीणों का कहना है कि गोविंद सिंह वर्मा ने अपना पूरा जीवन समाज सेवा, संस्कार और प्रेम के साथ बिताया। यही कारण है कि उनकी विदाई भी एक प्रेरणा बन गई। इस अनोखी अंतिम यात्रा ने यह संदेश दिया कि यदि व्यक्ति जीवन को पूरी ईमानदारी और संतोष के साथ जीता है, तो उसकी विदाई भी उत्सव का रूप ले सकती है।

दीवाड़िया गांव से निकली यह अनोखी अंतिम यात्रा अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोग इसे एक सकारात्मक सोच और जीवन दर्शन का उदाहरण मान रहे हैं।