उत्तर प्रदेश ATS ने वाराणसी में बड़ी कार्रवाई करते हुए 30 लाख रुपये के इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह को मुठभेड़ में मार गिराया। रविवार सुबह करीब 4 बजे रामनगर थाना क्षेत्र में ATS की टीम ने उसे घेरा था। पुलिस के मुताबिक, बृजेश अपने एक साथी के साथ बाइक से मुगलसराय की तरफ जा रहा था। टीम ने उसे रुकने का इशारा किया, लेकिन उसने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी।
ATS की घेराबंदी के बाद शुरू हुई फायरिंग
ATS के DSP विपिन राय के मुताबिक, टीम को सूचना मिली थी कि बृजेश गंझू रामनगर के रास्ते मुगलसराय की ओर जा रहा है। सूचना के आधार पर कमांडो ने इलाके में घेराबंदी की। इसी दौरान बृजेश अपने साथी के साथ बाइक से वहां पहुंचा। पुलिस का कहना है कि रुकने का इशारा करने पर बृजेश ने दोनों हाथों से पिस्टल निकालकर फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान DSP विपिन राय और हेड कॉन्स्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी गोली लगी। इसके बाद ATS ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें बृजेश घायल होकर सड़क पर गिर गया।
अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने मृत घोषित किया
मुठभेड़ के बाद ATS की टीम घायल बृजेश को जिला अस्पताल लेकर पहुंची। डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। उसका साथी मौके से फरार होने में सफल रहा। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर जांच शुरू कर दी है। मौके से दो पिस्टल, कई जिंदा कारतूस और खोखे बरामद किए गए हैं। फोरेंसिक टीम ने भी घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए हैं। बृजेश के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाल बहादुर शास्त्री पोस्टमार्टम हाउस भेजा गया है।
TPC का कमांडर था बृजेश गंझू
46 वर्षीय बृजेश गंझू झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र का रहने वाला था। वह प्रतिबंधित नक्सली संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) का कमांडर बताया गया है। पुलिस के अनुसार, वह ट्रांसपोर्टरों, कोयला खनन कंपनियों और ठेकेदारों से वसूली करता था। उस पर झारखंड सरकार ने 25 लाख रुपये और NIA ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। करीब आठ साल पहले टेरर फंडिंग मामले में NIA ने उसे वांटेड घोषित किया था। इसी मामले में उसके घर की कुर्की की कार्रवाई भी की गई थी।
कई नामों से रह रहा था, 39 केस दर्ज
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक बृजेश गंझू कई नामों से पहचान बदलकर ठिकाने बदलता रहा। उसके नाम गोपाल सिंह भोक्ता, दुलारचंद गंझू, रंजन, फुलचंद गंझू और सरदार भी दर्ज बताए जाते हैं। चतरा जिले में उसके खिलाफ 39 मामले दर्ज होने की बात सामने आई है। बृजेश लंबे समय से नक्सली गतिविधियों में सक्रिय था। शुरुआत में वह बीड़ी पत्ता के ठेकेदारों से वसूली करता था। बाद में सीसीएल की आम्रपाली और मगध कोयला परियोजनाओं के आसपास सक्रिय होकर खनन कंपनियों से वसूली का नेटवर्क चलाने लगा। बताया जाता है कि 2004 में उसने भाकपा माओवादी से अलग होकर अपना गुट बनाया था। इसके बाद झारखंड के चतरा, रांची और हजारीबाग समेत कई इलाकों में उसका प्रभाव बढ़ा। बिहार के कुछ हिस्सों में भी उसने अपना नेटवर्क फैलाया। वर्ष 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया चुना गया था।