स्वयं प्रकट हुई देवी वाराही
देवी वाराही का यह मंदिर स्वयंभू माना जाता है, यानी देवी की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई थी। मंदिर किसने बनवाया, इसकी जानकारी आज भी रहस्य बनी हुई है। यह मंदिर जमीन के अंदर है, और दर्शन एक ऊपरी झरोखे से ही संभव होते हैं। मंदिर का गर्भगृह केवल पुजारी के लिए ही खुलता है।

केवल डेढ़ घंटे के लिए खुलता है पट
इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह केवल सुबह डेढ़ घंटे (7:00 से 8:30 बजे तक) ही दर्शन के लिए खुलता है। मान्यता है कि इतने कम समय में देवी के दर्शन करने मात्र से ही भक्तों को विशेष फल प्राप्त होते हैं, और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
देवी वाराही का स्वरूप और आध्यात्मिक शक्ति
देवी वाराही चौसठ योगिनियों में से एक हैं और उनका स्थान 28वां माना जाता है। वे भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति मानी जाती हैं। उनके मुख का स्वरूप वराह का है, जो उनके उग्र रूप और शक्ति का प्रतीक है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवी ने असुरों के विरुद्ध युद्ध में सेना की कमान संभाली थी।

काशी की रक्षक मानी जाती हैं देवी वाराही
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, देवी वाराही को काशी की क्षेत्रपाल देवी माना जाता है, जो पूरे नगर की रक्षा करती हैं। कुछ मान्यताएं यह भी कहती हैं कि इस स्थान पर सती का दांत गिरा था, जिससे यह स्थल एक शक्तिपीठ के रूप में भी पूजनीय है।
Also Read- Marriage Sindoor Tradition: दुल्हन की मांग भरते वक्त नाक पर गिरा सिंदूर, शुभ या अशुभ?