उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मदरसों को बंद किए जाने पर धामी सरकार को 6 हफ्तों में जवाब देने को कहा

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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मदरसों को बंद किए जाने पर धामी सरकार को 6 हफ्तों में जवाब देने को कहा

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मदरसों को बंद किए जाने पर धामी सरकार को 6 हफ्तों में जवाब देने को कहा

Uttarakhand High Court madrasa closure notice : उत्तराखंड में मदरसे बंद करने को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। राज्य सरकार ने मदरसों को बिना पूर्व नोटिस दिए बंद करने की कार्रवाई की थी। इस मुद्दे पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सोमवार को धामी सरकार को नोटिस जारी किया है और 6 हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है।

उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025 और विवाद

धामी सरकार ने हाल ही में विधानसभा में “उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025” पास किया था। इस विधेयक के तहत मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम तथा गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसों के मान्यता नियमों को 1 जुलाई 2026 से समाप्त किया जाएगा। इसका मकसद प्रदेश के सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए समान और पारदर्शी नियम बनाना है। हालांकि, सरकार द्वारा मदरसों को बिना नोटिस बंद करना अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है। read more : ऑपरेशन कालनेमि में 300 से ज्यादा गिरफ्तारी, CM धामी का बड़ा संदेश

हाईकोर्ट का आदेश और अल्पसंख्यकों के अधिकार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान चलाने का संविधानिक अधिकार प्राप्त है। इसलिए बिना उचित प्रक्रिया के मदरसों को बंद करना उचित नहीं है। कोर्ट ने धामी सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह इस मामले में छह हफ्तों में जवाब दें। वहीं मदरसों को भी आवश्यक अनुमति प्राप्त करनी होगी।

Uttarakhand High Court madrasa closure notice : मदरसों की मान्यता और निगरानी

विधेयक के लागू होने के बाद सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध, पारसी समेत अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षणिक संस्थानों को भी पारदर्शी मान्यता के दायरे में लाया जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

मदरसा बंद करने की कार्रवाई से राज्य में सामाजिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस मुद्दे ने संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल खड़े कर दिए हैं। अब पूरे मामले पर आगे की सुनवाई और सरकार की प्रतिक्रिया से स्थिति स्पष्ट होगी।

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