Kota's Jagdish Temple Ritual

Kota Famous Jagdish Temple: ऐसा मंदिर जहां भगवान साल में 14 दिन के लिए हो जाते हैं बीमार

Kota's Jagdish Temple upholds a 250-year-old tradition where deities are given a 'sickness leave' during the intense summer heat.

By : हेमा गुप्ता
Kota Famous Jagdish Temple: ऐसा मंदिर जहां भगवान साल में 14 दिन के लिए हो जाते हैं बीमार

Kota Famous Jagdish Temple: ऐसा मंदिर जहां भगवान साल में 14 दिन के लिए हो जाते हैं बीमार

Kota Famous Jagdish Temple: कोटा के रामपुरा में स्थित ऐतिहासिक जगदीश मंदिर में सदियों पुरानी आस्था और परंपरा आज भी जीवंत है। हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भगवान जगदीश (कृष्ण), बलभद्र और सुभद्रा को 14 दिनों का विशेष “बीमारी अवकाश” दिया जाता है। यह परंपरा करीब 250 वर्षों से चली आ रही है और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।

भीषण गर्मी में  भगवान हो जाते हैं ‘बीमारी’ 

मान्यता है कि, प्रचंड गर्मी के मौसम में भगवान को ठंडे जल से स्नान कराने और आमरस का भोग लगाने के बाद उनकी तबीयत खराब हो जाती है। इस वजह से विशेष धार्मिक विधि-विधान के साथ उनका अभिषेक किया जाता है और फिर उन्हें 14 दिनों के लिए विश्राम के लिए एकांत में रखा जाता है।

इस वर्ष हुआ भव्य अभिषेक

इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान का 51 जलकलशों और पंचामृत से विशेष अभिषेक किया गया। पूजा-अर्चना और महाआरती के बाद करीब 200 किलो आमरस का भोग अर्पित किया गया। भोग के बाद रात 9 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए गए। अब अगले 14 दिनों तक भगवान विश्राम अवस्था में रहेंगे और आम श्रद्धालुओं के दर्शन पूर्ण रूप से बंद रहेंगे।

आराम में ना हो व्यवधान उसके लिए विशेष प्रावधान

मंदिर प्रशासन भगवान के आराम में किसी प्रकार का व्यवधान न हो, इसके लिए पूरी सावधानी बरतता है। मंदिर परिसर की घंटियों और झालरों को कपड़े से ढक दिया जाता है, ताकि कोई आवाज न हो सके। पूरे मंदिर में शांति और सादगी का वातावरण बनाए रखा जाता है।

प्रतिदिन स्वास्थ्य परीक्षण और विशेष काढ़ा

मंदिर के पुजारी और स्थाई निवासी बताते हैं कि - 'इन 14 दिनों में भगवान का प्रतिदिन “स्वास्थ्य परीक्षण” किया जाता है। नियमित भोग की जगह उन्हें दूध, मेवे और काली मिर्च से तैयार विशेष काढ़ा अर्पित किया जाता है।'

मान्यता है कि- इससे भगवान शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान केवल मुख्य पुजारी को ही गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति होती है। श्रद्धालु मंदिर परिसर तक आ सकते हैं, लेकिन गर्भगृह के दर्शन नहीं कर पाते।

250 साल पुरानी परंपरा और मंदिर का इतिहास

लगभग 250 वर्ष पहले दक्षिण भारत से आए महाराज अपलाचारी स्वामी ने इस मंदिर की स्थापना की थी। उस समय हाड़ौती क्षेत्र के श्रद्धालु जगन्नाथ पुरी नहीं पहुंच पाते थे। इसलिए स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए रामपुरा में भगवान जगदीश, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं स्थापित की गईं। 

वर्तमान में मंदिर की सेवा अपलाचारी स्वामी के परिवार की छठी पीढ़ी द्वारा की जा रही है। एस.के. श्रीनिवास मंदिर की व्यवस्था और पूजा-पाठ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंदिर में पूजा, भोग, भजन-कीर्तन और साफ-सफाई की सेवाएं चार लोग नियमित रूप से देते हैं। रामपुरा का यह प्राचीन जगदीश मंदिर आज भी कोटा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। यह अनोखी परंपरा हर वर्ष श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत करती है।
 

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