झज्जरः 29,000 फीट तक उड़ने वाला बार-हेडेड हंस बना आकर्षण

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झज्जरः 29,000 फीट तक उड़ने वाला बार-हेडेड हंस बना आकर्षण

झज्जरः 29000 फीट तक उड़ने वाला बार-हेडेड हंस बना आकर्षण

Bar Headed Geese Flock to Jhajjar: झज्जर। सर्दियों की दस्तक के साथ हरियाणा के झज्जर जिले का दिघल क्षेत्र एक बार फिर प्रवासी पक्षियों से गुलज़ार हो गया है। जलभराव वाले खेतों और छोटे तालाबों के किनारे इन दिनों विदेशी प्रजातियों का ऐसा जमाव देखा जा रहा है, मानो पूरा इलाका एक जीवंत पक्षी अभयारण्य बन गया हो। इस बार विशेष आकर्षण है बार-हेडेड हंस वह प्रजाति जिसकी 29,000 फीट की अविश्वसनीय उड़ान क्षमता वैज्ञानिकों को भी चकित करती है।

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विशेषज्ञ बताते हैं कि यह दुनिया की विरलतम प्रजातियों में है, जो इतनी ऊंचाई तक उड़ पाती है। इसकी तुलना में ईगल लगभग 10,000 फीट तक ही ऊंचाई पकड़ पाता है।

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दिघल के तालाबों में बढ़ी चहल-पहल

इस मौसम में यहां बार-हेडेड गूज के अलावा ग्रे-लेग्ड गूज, नॉर्दर्न पिंटेल, नॉर्दर्न शॉवेलर, गडवाल, कॉमन पोचर्ड और कॉमन स्नाइप जैसे प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में दिख रहे हैं। अधिकांश प्रजातियां 200 से 1,000 के समूहों में लंबी यात्राएँ तय करके यहां पहुंचती हैं कुछ हजारों किलोमीटर दूर साइबेरिया और मध्य एशिया से।

पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय की ऊपरी चोटियों पर भारी बर्फबारी होने के बाद भोजन और खुले जल स्रोत कम हो जाते हैं। यही वजह है कि प्रवासी पक्षी नवंबर से फरवरी-मार्च तक के लिए झज्जर जैसे अपेक्षाकृत गर्म और खाद्य-समृद्ध इलाकों का रुख करते हैं।

185 प्रजातियों का आगमन दर्ज -बर्ड वॉचर जगत वर्मा

दिघल क्षेत्र में दशकों से पक्षियों का अध्ययन कर रहे बर्ड वॉचर जगत वर्मा बताते हैं, मैं 1986 से इस फील्ड में हूं। अब तक हमने भारत और विदेशों से लगभग 185 प्रजातियों का आगमन दर्ज किया है। इस बार भी साइबेरिया से पहुंचे बार-हेडेड गूज यहां दिख रहे हैं। हिमालय पार करने की उनकी क्षमता इन्हें बाकी प्रवासी पक्षियों से अलग बनाती है। वर्मा का कहना है कि यह प्रजाति शांत स्वभाव की होती है और यहां लगभग पांच महीने तक रुकती है।

कृषि क्षेत्र बनता है भोजन का स्वाभाविक स्रोत

इस समय हरियाणा में गेहूं और सरसों की फसलें खेतों में लहलहा रही हैं। इन्हीं फसलों के बीच मिलने वाले कीड़ों की अधिकता प्रवासी पक्षियों को आसान भोजन उपलब्ध कराती है। वर्मा कहते हैं, यहां भोजन की कमी नहीं होती, इसलिए पक्षी सदियों से इस इलाके को अपना ठिकाना बनाते आए हैं। हालांकि, सर्दियों में इनके प्रजनन की संभावना बहुत कम रहती है। अधिकांश झुंड सीमित परिधि में घूमते हैं और भोजन मिलते ही देर तक यहीं टिक जाते हैं।

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