पंजाब में बढ़ती उमस और लगातार बदलते तापमान ने एक बार फिर मौसमी बीमारियों का खतरा बढ़ा दिया है। सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में बुखार, श्वसन संक्रमण, उल्टी-दस्त और पेट संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल गर्मी और मानसून के दौरान इस तरह की बीमारियां चिंता का कारण बनती हैं, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री सेहत योजना मरीजों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आई है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
पानी और संक्रमण से जुड़ी बीमारियों में बढ़ोतरी
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में पानी से फैलने वाली बीमारियों और श्वसन संक्रमण के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। एंटरिक फीवर के 1,396 मामले सामने आए, जिनके इलाज पर ₹30.47 लाख के दावे किए गए। वहीं निमोनिया के 377 मामलों पर ₹11.06 लाख और एक्यूट ब्रोंकाइटिस के 326 मामलों पर ₹9.24 लाख खर्च हुए।
हालांकि डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे मानसून से जुड़ी बीमारियों के मामले फिलहाल सीमित हैं। डेंगू के 12, मलेरिया के 3 और चिकनगुनिया के 6 मामले दर्ज किए गए हैं। बावजूद इसके, स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को सतर्क रहने और लापरवाही से बचने की सलाह दे रहे हैं।
हर साल बढ़ता है अस्पतालों पर दबाव
सिविल अस्पताल पटियाला के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गोयल ने बताया कि गर्मी और उमस के कारण एक्यूट फेब्राइल इलनेस, श्वसन संक्रमण, त्वचा एलर्जी और आंखों से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर इलाज में देरी कर देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।
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डॉ. गोयल के मुताबिक मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत मरीजों को कैशलेस इलाज मिलने से आर्थिक बोझ काफी कम हुआ है। इससे मरीज समय पर अस्पताल पहुंच रहे हैं और गंभीर स्थितियों से बचाव संभव हो पा रहा है।
छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा
गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज, फरीदकोट के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शशि कांत धीर ने बताया कि छोटे बच्चे और शिशु इस मौसम में संक्रमण की चपेट में जल्दी आते हैं। तेज बुखार, डिहाइड्रेशन, उल्टी, सांस फूलना और लगातार कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जागरूकता अभियान, साफ-सफाई, टीकाकरण और मच्छर नियंत्रण जैसे उपाय ही मौसमी बीमारियों पर प्रभावी रोक लगा सकते हैं।