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उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती, कर्मचारियों को मिलेगा 16 से 20 हजार रुपये मासिक मानदेय

उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती कर्मचारियों को मिलेगा 16 से 20 हजार रुपये मासिक मानदेय

UP Outsourced Employees Recruitment: उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी विभागों में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती के लिए एक महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन किया है। अब सरकार खुद आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया को संचालित करेगी, जो पारदर्शिता और कर्मचारी हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने कैबिनेट बैठक में इसकी जानकारी दी। यह कदम लगभग 10-12 लाख आउटसोर्स और संविदा कर्मचारियों के कल्याण के लिए उठाया गया है। नई नीति के तहत उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सर्विस कॉर्पोरेशन लिमिटेड की स्थापना की गई है, जो कंपनियों एक्ट 2013 की धारा 8 के तहत एक गैर-लाभकारी सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी के रूप में कार्य करेगी। यह कॉर्पोरेशन GeM पोर्टल के माध्यम से एजेंसियों का पैनल तैयार करेगा, जिससे विभागों द्वारा सीधे एजेंसी चयन की प्रथा समाप्त हो जाएगी।

[caption id="attachment_102990" align="alignnone" width="479"]उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती उत्तर प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती[/caption]

नई भर्ती प्रक्रिया

नई प्रक्रिया में भर्ती पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी होगी। कर्मचारियों को 16,000 से 20,000 रुपये मासिक मानदेय मिलेगा, जो तीन साल के अनुबंध के लिए होगा। अनुबंध समाप्ति के बाद नवीनीकरण की संभावना रहेगी। वेतन हर महीने की 1 से 5 तारीख के बीच सीधे बैंक खाते में जमा होगा। पीएफ और ईएसआई जैसी सुविधाएं अनिवार्य होंगी। महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश मिलेगा, जबकि सभी कर्मचारियों को समय-समय पर प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। यदि सेवा के दौरान कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, तो 15,000 रुपये की अंतिम संस्कार सहायता दी जाएगी।

UP Outsourced Employees Recruitment: आउटसोर्स भर्ती प्रतिबंधित

भर्ती लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के माध्यम से होगी, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगजन, पूर्व सैनिकों और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होगा। स्थायी पदों पर आउटसोर्स भर्ती प्रतिबंधित रहेगी। पहले से कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित रहेगी; मौजूदा एजेंसी का टेंडर समाप्त होने पर उन्हें नई कंपनी के माध्यम से उसी विभाग में रखा जाएगा। यह नीति 2025 की कैबिनेट बैठक में मंजूर हुई, जो कर्मचारियों के शोषण को रोकने और पारदर्शिता बढ़ाने पर केंद्रित है। [caption id="attachment_102991" align="alignnone" width="496"]एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगजन, पूर्व सैनिकों और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगजन, पूर्व सैनिकों और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू[/caption]

नई प्रक्रिया के लाभ और प्रभाव

नई नीति से आउटसोर्स कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा और आरक्षण लाभ मिलेंगे, जो पहले अनियमित थे। कॉर्पोरेशन एजेंसियों की निगरानी करेगा, जिससे वेतन भुगतान और सुविधाओं में देरी समाप्त हो जाएगी। यह कदम राज्य के औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देगा। योगी सरकार का यह प्रयास उत्तर प्रदेश को बेहतर शासन का मॉडल बनाने की दिशा में है।

पुरानी आउटसोर्स भर्ती प्रक्रिया

पहले, उत्तर प्रदेश सरकार के विभागों में आउटसोर्स भर्ती निजी एचआर फर्मों या एजेंसियों के माध्यम से होती थी। विभाग सीधे टेंडर जारी कर एजेंसियां चुनते थे, जो अक्सर अपारदर्शी और शोषणपूर्ण साबित होती थीं। 2019 में सरकार ने आउटसोर्स नीति बनाने की घोषणा की थी, लेकिन पूर्ण कार्यान्वयन नहीं हुआ। एजेंसियां कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन, पीएफ या ईएसआई नहीं देती थीं, जिससे शिकायतें बढ़ीं। उदाहरणस्वरूप, यूपी पावर कॉर्पोरेशन में 50,000 से अधिक संविदा कर्मचारियों ने यूनियन बनाने और नियमितीकरण की मांग की। भर्ती प्रक्रिया में कोई लिखित परीक्षा या साक्षात्कार नहीं होता था; एजेंसियां मनमाने ढंग से चयन करती थीं। आरक्षण का पालन अनियमित था, और वेतन देरी से मिलता था। टेंडर समाप्ति पर कर्मचारियों को नई एजेंसी में स्थानांतरित किया जाता था, लेकिन नौकरी असुरक्षा बनी रहती। Read MOre: सनातन हिंदू एकता पदयात्रा का ऐलान: वृंदावन में बड़ी बैठक, धीरेंद्र शास्त्री बोले- हिंदुओं एकजुट हो जाओ…

पुरानी प्रक्रिया की कमियां 

UP Outsourced Employees Recruitment: पुरानी व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी के कारण भ्रष्टाचार और शोषण की घटनाएं आम थीं। एजेंसियां लाभ के लिए वेतन काटती थीं, और विभागों की निगरानी अपर्याप्त थी। 2024 में भी, पुलिस भर्ती जैसे मामलों में आउटसोर्स पत्र वायरल होने पर विवाद हुआ, हालांकि इसे गलती बताया गया। नीति आयोग की सिफारिशों के बावजूद, आउटसोर्स नीति पूरी तरह लागू नहीं हुई। कर्मचारियों को कोई मातृत्व अवकाश या प्रशिक्षण नहीं मिलता था, और मृत्यु पर कोई सहायता नहीं थी। यह प्रक्रिया विभागीय संसाधनों पर बोझ डालती थी, क्योंकि एजेंसियों का चयन और अनुबंध प्रबंधन जटिल था।

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