कांग्रेस को लीडिंग बनाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन नेता ढूंढ रहे हैं लीडिंग चैनल

कांग्रेस नेता मीडिया विभाजन

कांग्रेस को लीडिंग बनाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन नेता ढूंढ रहे हैं लीडिंग चैनल

कांग्रेस के नेता मुकेश नायक ने मीडिया को 'लीडिंग' और 'नॉन-लीडिंग' में विभाजित करते हुए कुछ पत्रकारों को इंटरव्यू से रोका, जिससे विवाद उत्पन्न हुआ।

कांग्रेस को लीडिंग बनाने की जिम्मेदारी थी लेकिन नेता ढूंढ रहे हैं लीडिंग चैनल

कांग्रेस के जिन नेताओं के कंधों पर पार्टी को मजबूत और "लीडिंग कांग्रेस" बनाने की जिम्मेदारी थी, वे अब मीडिया में भी "लीडिंग चैनल" तलाशते नजर आ रहे हैं।कांग्रेस के अधिकांश नेता अक्सर यह आरोप लगाते नहीं थकते कि मीडिया उनकी खबरों को प्राथमिकता नहीं देती। कई बड़े नेता सार्वजनिक मंचों से भी यह शिकायत कर चुके हैं। लेकिन जब मीडिया उनकी खबरें कवर करने पहुंचती है, तब यही नेता मीडिया को भी छोटे और बड़े वर्गों में बांटते दिखाई देते हैं।

मीनाक्षी नटराजन का इंटरव्यू करने से रोका

मामला कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के टिकट मिलने के बाद पहली बार प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पहुंचने का है। इस दौरान उन्होंने पार्टी नेताओं से मुलाकात की और कांग्रेस मीडिया विभाग के कक्ष में भी पहुंचीं, जहां उनकी मुलाकात मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक से हुई।
बताया जाता है कि वहां मौजूद तीन पत्रकारों ने मीनाक्षी नटराजन का इंटरव्यू करने की इच्छा जताई। इस पर मुकेश नायक ने उन्हें रोकते हुए कहा कि अभी "लीडिंग चैनल" नहीं पहुंचे हैं, इसलिए फिलहाल बातचीत नहीं होगी।

यह मामला केवल एक इंटरव्यू का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जो कांग्रेस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष की पत्रकारों के प्रति दिखाई देती है।

मुकेश नायक से सवाल है कि जब कांग्रेस धरना-प्रदर्शन करती है, तब वहां कई बार कार्यकर्ताओं से ज्यादा पत्रकार मौजूद होते हैं। इनमें अधिकांश पत्रकार वही होते हैं जिन्हें शायद आपकी नजर में "नॉन-लीडिंग" मीडिया कहा जाता होगा। आए दिन कांग्रेस के नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और उन प्रेस कॉन्फ्रेंसों में लगी कुर्सियां भी इन्हीं नॉन लीडिंग मीडिया संस्थानों के पत्रकारों से भरी होती हैं।

दोनों पत्रकारों के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता

सच्चाई यह भी है कि कांग्रेस के कई प्रदर्शन और प्रेस कॉन्फ्रेंस की खबरें तथाकथित "लीडिंग चैनलों" के टिकर तक पर नहीं चल पातीं। ऐसे में यही नॉन लीडिंग मीडिया संस्थान कांग्रेस के मुद्दों को जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं।

शायद कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष यह भूल रहे हैं कि आज के डिजिटल युग में कोई भी मीडिया संस्थान छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटा-बड़ा केवल काम और प्रभाव होता है। आज कई छोटे यूट्यूब चैनलों, वेबसाइटों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रकाशित खबरें राष्ट्रीय चैनलों की हेडलाइन बन जाती हैं।

ऐसे में यदि किसी पत्रकार को सिर्फ इसलिए इंटरव्यू करने से रोका जाए क्योंकि वह किसी तथाकथित "लीडिंग चैनल" से नहीं है, तो यह पत्रकारिता और दोनों पत्रकारों के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।

और यदि विपक्ष में रहते हुए पत्रकारों के प्रति यह रवैया है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सत्ता में रहते हुए व्यवहार कैसा होता?

मीडिया को बांटकर नहीं, सम्मान देकर जीता जाता है

कांग्रेस को यह समझना होगा कि मीडिया को श्रेणियों में बांटकर नहीं, बल्कि सम्मान देकर ही संवाद मजबूत किया जा सकता है। यदि पत्रकारों और पत्रकारिता के प्रति यही सोच बनी रही, तो राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। ऐसे में पांच साल तो छोड़िए, अगले पचास साल तक सत्ता की राह और कठिन हो सकती है।

भोपाल से पीयूष साहू की रिपोर्ट 

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