मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को ज्ञान भारतम मिशन के संबंध में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक को संबोधित करते हुए प्रदेशवासियों से प्राचीन पाण्डुलिपियों के संरक्षण और संवर्धन में सक्रिय सहयोग देने की अपील की। उन्होंने कहा कि केवल मठों, मंदिरों और आश्रमों में ही नहीं, बल्कि अनेक परिवारों और निजी संग्रहों में भी देश की अमूल्य ज्ञान-संपदा सुरक्षित है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।
मप्र सीएम डॉ यादव
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक स्मृतियां, ज्ञान परंपराएं, विज्ञान, दर्शन और ऐतिहासिक विरासत आज भी पाण्डुलिपियों के रूप में संरक्षित हैं। इन धरोहरों के व्यवस्थित संरक्षण, दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान भारतम मिशन की शुरुआत की गई है।
वर्ष 1950 से पहले की पाण्डुलिपियों का हो रहा डिजिटलीकरण
डॉ. यादव ने बताया कि मिशन के तहत वर्ष 1950 से पूर्व की पाण्डुलिपियों का डिजिटल संरक्षण किया जा रहा है। इसके अंतर्गत ताड़पत्र, ताम्रपत्र, भोजपत्र, प्रस्तर अभिलेख, पोथियों तथा अन्य पारंपरिक माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री को संरक्षित किया जाएगा। यह अभियान मंदिरों, मठों, आश्रमों, पुस्तकालयों, शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों के साथ-साथ निजी घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक विस्तारित किया गया है।
पाण्डुलिपि
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध राज्य है। प्रदेश के अनेक धार्मिक स्थलों, परिवारों और संस्थानों के पास बड़ी संख्या में दुर्लभ पाण्डुलिपियां मौजूद हैं, जिन्हें राष्ट्रीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
शोधार्थियों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका अहम
बैठक में जानकारी दी गई कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में लगभग 10 लाख 24 हजार 571 पाण्डुलिपियां उपलब्ध होने का अनुमान है। इनके संरक्षण के लिए जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में समितियां गठित की गई हैं। ज्ञान भारतम मोबाइल एप के माध्यम से पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण और डिजिटल अपलोडिंग की प्रक्रिया जारी है।
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि जिला स्तर पर पाण्डुलिपि धारकों से संवाद स्थापित कर उन्हें अभियान से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि इस कार्य में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, शोध संस्थानों और शोधार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखने का यह अभियान व्यापक जनसहभागिता के साथ सफल हो सके।